Nahargarh Fort History in Hindi: नाहरगढ़ किले का इतिहास, रहस्य और रोचक तथ्य
जयपुर, जिसे देश-दुनिया में ‘गुलाबी नगरी’ के नाम से जाना जाता है, राजस्थान के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। हर साल देश-विदेश से लाखों पर्यटक यहां की ऐतिहासिक इमारतों, महलों और किलों को देखने पहुंचते हैं। दिल्ली से करीब 250 किलोमीटर दूर जयपुर पहुंचना भी काफी आसान है। आप सड़क मार्ग, वॉल्वो बस, ट्रेन या हवाई जहाज से यहां आ सकते हैं।
जयपुर के इन्हीं ऐतिहासिक स्थलों में नाहरगढ़ किले का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। अरावली की पहाड़ियों पर बना यह किला अपनी खूबसूरत लोकेशन, शानदार वास्तुकला और इससे जुड़ी कई दिलचस्प कहानियों के लिए जाना जाता है। नाहरगढ़ नाम का अर्थ ‘बाघों का निवास’ बताया जाता है।
किले के अंदर बना माधवेंद्र भवन इसकी खास पहचान है। इसे सवाई माधो सिंह ने बनवाया था और इसमें शाही परिवार के लिए अलग-अलग कक्ष बनाए गए थे। खास बात यह है कि यहां राजा के लिए एक कक्ष के साथ उनकी रानियों के लिए अलग-अलग कक्ष भी बनाए गए थे।
आखिर नाहरगढ़ किले का इतिहास क्या है? इसे क्यों बनवाया गया था और इससे जुड़ी कौन-कौन सी रोचक कहानियां आज भी लोगों के बीच मशहूर हैं? आइए जानते हैं नाहरगढ़ किले के इतिहास और इससे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।
जयपुर में नाहरगढ़ किले के अलावा भी कई ऐसी ऐतिहासिक जगहें हैं, जिन्हें अपनी trip में शामिल किया जा सकता है। अगर आप जयपुर की पूरी यात्रा plan कर रहे हैं, तो जयपुर में घूमने की सबसे अच्छी जगहें वाली हमारी guide भी देख सकते हैं।
नाहरगढ़ किले का इतिहास
जयपुर शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियों पर स्थित नाहरगढ़ किला जयपुर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। इस किले का निर्माण 1734 ईस्वी में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय के शासनकाल में शुरू हुआ था। इसके बाद समय-समय पर किले में कई निर्माण और विस्तार किए गए।
नाहरगढ़ किले के अंदर बना माधवेंद्र भवन यहां आने वाले पर्यटकों के लिए खास आकर्षण है। सवाई माधो सिंह द्वारा बनवाया गया यह महल शाही परिवार के ग्रीष्मकालीन निवास के रूप में इस्तेमाल होता था। महल में रानियों के लिए अलग-अलग कक्ष बनाए गए थे, जिन्हें गलियारों के जरिए आपस में जोड़ा गया है। इन गलियारों और कमरों की दीवारों पर खूबसूरत भित्तिचित्र भी देखने को मिलते हैं।
नाहरगढ़ किले की ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने की वजह से यहां से पूरे जयपुर शहर का शानदार नजारा दिखाई देता है। दिन में जहां यहां से गुलाबी शहर की खूबसूरती देखने को मिलती है, वहीं शाम के बाद जब जयपुर की रोशनी जगमगाने लगती है, तो किले से दिखाई देने वाला नजारा और भी आकर्षक हो जाता है। राजस्थान पर्यटन भी किले से रात के समय जयपुर की रोशनी के खूबसूरत दृश्य का उल्लेख करता है।
नाहरगढ़ किले के नाम का रहस्य
नाहरगढ़ किले को पहले सुदर्शनगढ़ के नाम से जाना जाता था। लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर नाहरगढ़ क्यों रखा गया? इसके पीछे एक दिलचस्प लोककथा जुड़ी हुई है।
कहा जाता है कि जब किले का निर्माण शुरू हुआ, तो कारीगर दिनभर मेहनत करके जो काम पूरा करके जाते थे, अगली सुबह उसका कुछ हिस्सा टूटा हुआ मिलता था। कई बार ऐसा होने के बाद भी किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर निर्माण कार्य बार-बार क्यों खराब हो रहा है।
आखिरकार इस रहस्य का पता लगाने के लिए एक तांत्रिक को बुलाया गया। लोककथा के अनुसार, तांत्रिक ने बताया कि इस जगह पर नाहर सिंह नाम की आत्मा का वास है। वह किले का नाम सुदर्शनगढ़ रखने से नाराज थी और चाहती थी कि किले का नाम उसके नाम पर रखा जाए।
इसके बाद किले का नाम सुदर्शनगढ़ से बदलकर नाहरगढ़ कर दिया गया। मान्यता है कि इसके बाद किले का निर्माण बिना किसी बड़ी रुकावट के आगे बढ़ने लगा। नाहर सिंह के नाम पर किले के परिसर में एक मंदिर भी बनवाया गया, जिसे आज भी देखा जा सकता है।
महलों के नाम और उनकी खासियत
जैसा कि अब आप जान चुके हैं, इस किले के अंदर कई खूबसूरत महल बने हुए हैं। इनमें राजा माधव सिंह जी का मुख्य महल भी शामिल है। राजा के महल के ठीक सामने वाला महल पटरानी के लिए बनाया गया था।
यहाँ बने महलों के नाम चाँद प्रकाश, आनंद प्रकाश, लक्ष्मी प्रकाश, ललित प्रकाश, सूरज प्रकाश, जवाहर प्रकाश और खुशहाल प्रकाश बताए जाते हैं।
इन महलों को उस समय की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। रानियों के लिए अलग टॉयलेट, रसोई के धुएँ को बाहर निकालने की व्यवस्था और दासियों के लिए अलग कमरे व टॉयलेट जैसी सुविधाएँ भी यहाँ मौजूद थीं। खास बात यह है कि इनकी कई व्यवस्थाओं को आज भी देखा जा सकता है।
यह महल दो मंजिला था और मौसम के हिसाब से दोनों मंजिलों का इस्तेमाल किया जाता था। सर्दियों में नीचे वाली मंजिल का इस्तेमाल किया जाता था, क्योंकि वहाँ गर्माहट बनी रहती थी। वहीं, गर्मियों में ऊपर वाली मंजिल में रहना ज्यादा आरामदायक माना जाता था।
नाहरगढ़ के साथ जयपुर का प्रसिद्ध आमेर किला - जयपुर की विश्व धरोहर का गौरव भी जरूर देखें। दोनों जगहों की वास्तुकला और इतिहास में आपको काफी कुछ अलग देखने को मिलेगा।
इस महल की दीवारों के भी कान हैं
दीवारों के भी कान होते हैं यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी। लेकिन इस महल में आपको यह कहावत कुछ हद तक सच होती हुई नजर आएगी। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर दीवारों के कान कैसे हो सकते हैं? इसके पीछे महल की खास बनावट से जुड़ी एक दिलचस्प बात है।
कहा जाता है कि जब रानियाँ आराम करती थीं, तब दासियाँ उनकी देखभाल के लिए रातभर पहरा देती थीं। रात में पहरा देते समय दासियों को नींद न आए, इसलिए महल की दीवारों को इस तरह बनाया गया था कि वे आपस में धीमी आवाज में बातचीत कर सकें।
महल की बनावट ऐसी थी कि दासियों की आवाज एक-दूसरे तक आसानी से पहुँच जाती थी, जबकि उनकी बातचीत से रानियों की नींद में ज्यादा खलल नहीं पड़ता था।
महल की ये खास दीवारें आज भी यहाँ देखी जा सकती हैं। इन्हें देखकर आपको उस समय की वास्तुकला और महल को बनाने के पीछे की सोच का अंदाजा जरूर होता है।
राजा कैसे एक रानी के पास जाते थे, बाकी रानियों को पता नहीं चलता था
इस महल की बनावट की एक और खास बात थी। कहा जाता है कि राजा अगर किसी एक रानी के महल में जाते थे, तो बाकी रानियों को आसानी से पता नहीं चलता था। इसके लिए महल के अंदर आने-जाने के रास्तों को काफी सोच-समझकर बनाया गया था।
राजा के महल से सभी रानियों के महलों तक जाने के लिए एक अलग रास्ता था, जिसे किंग कॉरिडोर कहा जाता है। वहीं रानियों के लिए भी एक अलग रास्ता बनाया गया था, जिसे क्वीन कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है। इस रास्ते से रानियाँ एक-दूसरे के महल में आसानी से आ-जा सकती थीं।
महल की यह खास बनावट उस समय की वास्तुकला और वहाँ रहने की व्यवस्था को समझने में मदद करती है। इन कॉरिडोर को आज भी किले में देखा जा सकता है। इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि महल के अंदर आने-जाने की व्यवस्था कितनी सोच-समझकर तैयार की गई थी।
जयपुर की शाही खूबसूरती couples को भी काफी पसंद आती है। अगर आप अपनी अगली romantic trip के लिए कुछ खूबसूरत जगहें तलाश रहे हैं, तो भारत की 10 सबसे Romantic Honeymoon Places वाली हमारी guide भी पढ़ सकते हैं।
बावड़ियाँ
नाहरगढ़ किले में तीन बावड़ियाँ बनी हुई हैं। जैसा कि आप जानते हैं, यह किला पहाड़ी की चोटी पर बना है, इसलिए यहाँ पानी का मुख्य स्रोत बारिश का पानी ही था। इसी वजह से वर्षा के पानी को जमा करने के लिए किले में बावड़ियाँ बनाई गई थीं।
किले और पहाड़ी पर गिरने वाला बारिश का पानी नालियों के जरिए इन बावड़ियों तक पहुँचाया जाता था। पानी को सीधे बावड़ी में पहुँचाने के बजाय रास्ते में बनी छोटी-छोटी हौदियों से होकर गुजारा जाता था। इससे पानी में मौजूद कचरा और गंदगी काफी हद तक वहीं रुक जाती थी और साफ पानी आगे बावड़ी तक पहुँचता था।
बावड़ी के पास एक खास जल-संचयन और शोधन व्यवस्था भी बनाई गई थी। इसके जरिए बारिश के पानी को कई चरणों से गुजारकर बावड़ी तक पहुँचाया जाता था। उस समय पानी को बचाने और जरूरत के समय इस्तेमाल करने के लिए बनाई गई यह व्यवस्था किले की वास्तुकला की खासियतों में से एक थी।
किले में ये कुछ और आकर्षण भी हैं
नाहरगढ़ किले में ऐतिहासिक महलों और खूबसूरत वास्तुकला के अलावा कुछ और जगहें भी हैं, जिन्हें आप अपनी यात्रा के दौरान देख सकते हैं।
- नाहरगढ़ वैक्स म्यूजियम
- पांडव रेस्टोरेंट
- सनसेट पॉइंट
- शीश महल
नाहरगढ़ किले को देखने का समय
नाहरगढ़ किला सुबह 10:00 बजे खुलता है और शाम 5:30 बजे तक खुला रहता है। अगर आप किले के साथ आसपास की जगहें भी देखना चाहते हैं, तो थोड़ा पहले पहुँचने की कोशिश करें।
नाहरगढ़ किले की यात्रा के बाद अगर आप राजस्थान की दूसरी ऐतिहासिक और खूबसूरत जगहों को explore करना चाहते हैं, तो राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल: जयपुर से जैसलमेर तक पूरी जानकारी भी देख सकते हैं।





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